Sun. May 19th, 2024

Extramarital Affair: पुरुष के लिए अपराध, महिला के लिए संविधान के Article 21 के तहत स्वतंत्रता का अधिकार

By samacharpatti.com Apr 2, 2024
PHOTO

Extramarital Affair: शादीशुदा महिला तीन पुरुषों के साथ रहे, तो Live In Relationship, विवाहित पुरुष के लिए यह द्विविवाह अपराध

देश में सभी को संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत कानून के सामने समानता का अधिकार है। यानी, किसी एक ही तरह की परिस्थिति में कानून किसी के साथ भेदभाव नहीं करेगा। लेकिन, देश के अलग-अलग हाईकोर्ट के फैसले पढ़कर आम आदमी का दिमाग चकरा जाएगा कि आखिर क्या सही है और क्या गलत।
यहां हम देश के तीन हा​ईकोर्ट के फैसलों के बारे में बता रहे हैं, जो कमोबेश एक ही जैसी परिस्थितियों को लेकर दिए गए हैं। लेकिन, तीनों मामलों में अदालतों के फैसले इतने अलग-अलग हैं कि साधारण आदमी के लिए कानून के बारे में राय बनाना और वस्तुस्थिति को समझना लगभग नामुमकिन है।

इन फैसलों के बारे में बताएं, इससे पहले यह जान लेना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को 2018 में यह कहते हुए असंवैधानिक घोषित कर दिया था कि महिला-पुरुष के अधिकार बराबर हैं।

Extramarital Affair: पुरुष, महिला का मालिक नहीं है। धारा 497 के तहत व्यभिचार का कानून महिला-पुरुष की स्थिति में भेद करता है, लिहाजा इसे असंवैधानिक करार दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि धारा 497 पुरुष को मनमानी का अधिकार देती है, अगर पुरुष के लिए विवाहेत्तर संबंध व्यभिचार नहीं, तो महिला के लिए भी यह व्यभिचार गलत नहीं है।

दिलचस्प रूप से सुप्रीम कोर्ट ने यहां दो बातें और कही हैं, पहली-विवाहेत्तर संबंध तलाक का आधार हो सकते हैं। दूसरी-ऐसे संबंध तब अपराध माने जा सकते हैं, जब पति या पत्नी इसकी वजह से आत्महत्या कर ले।

पहला मामला

अब बात करते हैं, उन फैसलों की जो आपका दिमाग चकरा देंगे। सबसे पहले अक्टूबर 2023 में इलाहबाद हाईकोर्ट ने एक फैसला देते हुए कहा, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 7 को ध्यान में रखकर बिना सप्तपदी (सात फेरे) लिए हिंदू विवाह संपन्न नहीं होगा।

दरअसल, मामला एक जोड़े का 2017 में विवाह हुआ। लेकिन, कुछ दिन बाद ही आपसी लड़ाई झगड़े के चलते पत्नी और पति अलग-अलग रहने लगे। पत्नी मायके (पिता के घर) लौट गई। इसी दौरान दोनों का तलाक हो गया। अदालत ने लड़की को दूसरी शादी नहीं किए जाने तक 4,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण भत्ता देने का आदेश दिया।

वर्ष 2021 में लड़के को पता चला कि उसकी पूर्व पत्नी, तो लंबे समय से किसी के साथ लिव-इन-रिलेशनशिप में रह रही है। इस आधार पर लड़के ने भरण-पोषण भत्ता बंद करने और पत्नी के खिलाफ धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज कराई।

इस मामले में लड़की ने हाईकोर्ट का रुख किया, जहां लड़की के पक्ष में फैसला देते हुए जस्टिस संजय सिंह ने कहा, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 7 को ध्यान में रखकर बिना सप्तपदी (सात फेरे) लिए हिंदू विवाह संपन्न नहीं होता, लिहाजा यह नहीं माना जा सकता कि लड़की ने दूसरी शादी की है।

इस तरह वह अब भी भरण-पोषण भत्ते की हकदार है। यहां, गौर करने वाली बात यह है कि अदालत ने इस मामले में लिव-इन-रिलेशन को द्विविवाह अपराध नहीं माना है।

दूसरा मामला

नवंबर, 2023 में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने एक कपल को लिव-इन-रिलेशन में रहने के लिए सुरक्षा देने से यह कहते हुए इन्कार कर दिया कि तलाक के बिना वे लिव-इन-रिलेशन में नहीं रह सकते और अदालत लिव-इन के लिए दी जाने वाली सुरक्षा उन्हें नहीं दे सकती, क्योंकि वे द्विविवाह अपराध कर रहे हैं।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा, तलाक के बिना किसी पुरुष का दूसरी महिला के साथ रहना आईपीसी की धारा 494/495 के तहत द्विविवाह अपराध है।

साथ ही, टिप्पणी करते हुए कहा कि इस मामले में व्यभिचार के अपराध से बचने के लिए रिश्ते को लिव-इन का नाम दिया गया है। सुरक्षा पाने की याचिका के जरिये याचिकाकर्ता व्यभिचार के मुकदमे से बचने के लिए अदालत की मुहर लगवाना चाहते हैं।

तीसरा मामला

2 अप्रैल, 2024 को राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस बीरेंद्र कुमार ने फैसला दिया कि एक शादीशुदा महिला का किसी और पुरुष से संबंध बनाना व्यविभचार नहीं है और वह लिव-इन-रिलेशन में रहने के लिए स्वतंत्र है।

इसके अलावा यह धारा 494 के तहत द्विविवाह अपराध भी नहीं माना जाएगा, क्योंकि महिला ने दूसरी शादी नहीं की है। असल में एक व्यक्ति ने तीन लोगों पर पत्नी के अपहरण और दुष्कर्म का आरोप लगाया।

लेकिन, महिला ने अदालत में पहुंचकर कहा कि वह खुद तीनों के साथ मर्जी से गई थी और तीनों में से एक व्यक्ति के साथ लिव-इन-रिलेशनशिप में रह रही है।

कानूनी बारीकियों के लिहाज से इन तीनों मामलों में कुछ अंतर जरूर हो सकते हैं। लेकिन, मोटे तौर पर इनसे समाज के बीच यह धारणा बनती है कि शादीशुदा महिला के लिए लिव-इन द्विविवाह अपराध नहीं है, वहीं शादीशुदा पुरुष के लिए यह अपराध है। इसके अलावा, अगर पुरुष याचिकाकर्ता है, तो उसके लिव-इन को विवाह मान लिया जाएगा, लेकिन महिला के लिव-इन को विवाह नहीं माना जाएगा, क्योंकि उसमें सप्तपदी नहीं हुई है।

तकनीकी रूप से यहां भेद की वजह एक मामले में महिला का तलाकशुदा होना है, लेकिन सवाल यह उठता है कि अगर पुरुष के लिव-इन को द्विविवाह अपराध माना जा सकता है, तो महिला के लिव-इन को दूसरा विवाह मानकर उसको मिलने वाले भरण-पोषण भत्ते को खत्म क्यों नहीं किया जा सकता।

इसके अलावा शादीशुदा पुरुष दूसरी महिला के साथ लिव-इन में रहेगा, तो अदालत कहती है कि वह व्यभिचार के आरोप से बचने के लिए इस रिश्ते को लिव-इन का नाम दे रहा है, वहीं जब शादीशुदा महिला लिव-इन में रहती है, तो अदालत कहती है कि यह किसी तरह का कोई अपराध नहीं। महिला, ऐसे रिश्ते के लिए स्वतंत्र है।

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *