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Katchatheevu Island: नेहरू ने कहा था, इस छोटे से द्वीप का कोई महत्व नहीं, न दिलचस्पी, इसे बेहिचक छोड़ रहे, जाने क्या है मामला ?

Katchatheevu Island

पंडित नेहरू ने छीना तमिल मछुआरों का अधिकार, जनता को यह जानने का हक: जयशंकर
20 साल में 6000 हजार से ज्यादा मछुआरे हुए गिरफ्तार, 11 हजार
75 नौकाएं की गईं जब्त


Katchatheevu Island [New Delhi]: कच्चातिवु द्वीप मामले पर विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने सोमवार (April 01, 2024) को कहा कि देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने हजारों तमिल मछुआरों का अधिकार छीना। उन्होंने कहा कि देश की जनता यह जानने का हक रखती है कि किस तरह से कांग्रेस-डीएमके ने कच्चातिवु को श्रीलंका को सौंप दिया और इस मामले को इस तरह से उठाया, मानो उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है।

दिल्ली भाजपा मुख्यालय में प्रेस वार्ता के दौरान उन्होंने कहा, हम जानते हैं कि यह किसने किया, हम नहीं जानते कि इसे किसने छिपाया। लेकिन, जनता को यह जानने का अधिकार है कि तमिल मछुआरों का हक किसने छीना।

इसके साथ ही उन्होंने सवाल उठाया कि कांग्रेस ने संसद में आश्वासन दिया गया था कि समझौते में भारतीयों के मछली पकड़ने के अधिकारों को सुरक्षित रखा गया है, फिर 1976 में भारतीय मछुआरों के मछली पकड़ने के अधिकार को क्यों छोड़ दिया गया।

उन्होंने कहा असल में जब 1958 और 1960 में मछुआरों ने जब यह मांग उठाई कि उन्हें कच्चातिवु में मछली पकड़ने का अधिकार मिले, तो मई 1961 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इसके प्रति उदासीनता दिखाते हुए कहा, इस छोटे से द्वीप को बिल्कुल भी महत्व नहीं देता और यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं कि इस पर अपना दावा छोड़ रहे हैं। इस तरह के मामले अनिश्चित काल तक लंबित रखना और संसद में बार-बार उठाया जाना पसंद नहीं है।

इसके बाद 1974 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने इस द्वीप को श्रीलंका को दे दिया और 1976 में वहां मछली पकड़ने का अधिकार भी छोड़ दिया। यह तथ्य बताता है कि उस दौर की सरकारों को इस बात की कोई परवाह नहीं थी कि इससे कितने ही लोगों के अधिकार प्रभावित होंगे। उन्होंने कहा कि पंडित नेहरू के लिए यह एक छोटा सा द्वीप था, जिसका कोई महत्व नहीं था और वे इसे एक उपद्रव के तौर पर देखते थे और मानते थे कि इसे जितनी जल्दी छोड़ देंगे, उतना बेहतर होगा। यही विचार इंदिरा गांधी ने जारी रखा, जिसे लेकर तमिलनाडु से उस वक्त के सांसद जी विश्वनाथन ने कहा, केंद्र सरकार भारतीय क्षेत्र से हजारों मील दूर डिएगो गार्सिया के बारे में चिंतित हैं, लेकिन उस द्वीप के बारे में चिंतित नहीं हैं, जिससे हजारों लोगों की आजीविका प्रभावित होगी।
जयशंकर ने कहा कि जब कच्चातिवु की बात हो रही है, तो वह दिन भी याद आ रहा है, जब जब पंडित नेहरू उत्तरी सीमा पर अक्साई चिन के लिए कहा था कि वहां घास का एक तिनका भी नहीं उगता। इसके बाद नेहरू कभी भी देश का विश्वास हासिल नहीं कर पाए।

ऐसा ही इंदिरा गांधी के साथ भी हुआ, जब उन्होंने कच्चातिवु को लेकर कहा कि यह केवल एक छोटी सी बात है। यह किसी एक प्रधानमंत्री की नहीं, बल्कि देश की जमीन और सीमाओं को लेकर कांग्रेस के ऐतिहासिक उपेक्षापूर्ण रवैय की बात है। उन्होंने कहा कि 1974 में हुए समझौते के बाद दो साल से भी कम वक्त में एक और समझौता हुआ, जिसके तहत तय दोनों देशों के लिए एक्सक्लूसिव इकॉनमिक जोन बनाना तय हुआ और इसके तहत कच्चातिवु से भारतीय मछुआरों से मछली पकड़ने का अधिकार छीन लिया गया।

इसी रवैये की वजह से पिछले 20 वर्ष में 6,184 भारतीय मछुआरों को श्रीलंका ने हिरासत में लिया और 1,175 नौकाओं को जब्त किया। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि डीएमके कच्चातिवु को श्रीलंका को सौंपने पर सवाल उठाती है, दावा करती है कि तमिलनाडु सरकार से सलाह नहीं ली गई, जबकि तथ्य यह है कि यह सब करुणानिधि की जानकारी में हुआ।
21 बार जवाब दिया

जयशंकर ने कहा कि पिछले पांच वर्षों में कच्चातिवु और मछुआरों का मुद्दा संसद में बार-बार उठाया गया है। संसद के सवालों, बहसों और सलाहकार समिति के सामने आया है। तमिलनाडु के मौजूदा मुख्यमंत्री को को इस मुद्दे पर 21 बार जवाब दिया है। यह एक जीवंत मुद्दा है जिस पर संसद और तमिलनाडु के हलकों में बहुत बहस हुई.

जयशंकर ने कहा कि ऐतिहासिक रूप से कोई ऐसा दस्तावेज नहीं, जिससे यह साबित किया जा सके कि कच्चातिवु श्रीलंका के पास था। 1947 से 1974 तक जब भी इस मामले में कोई विवाद हुआ, तो कानूनी सलाह ली गई। हर बार कानून विशेषज्ञों ने राय दी कि यह भारत का हिस्सा है। इस दौरान जितने भी अटॉर्नी जनरल और विदेश मंत्रालय के विधिक विशेषज्ञ थे, सभी ने केंद्र को सलाह दी कि कच्चातिवु भारत का है। अगर भारत इसे अपने अधिकार में नहीं रखना चाहता, तो कम से कम भारत के मछुवारों का वहां आने जाने और मछली पकड़ने का अधिकार रखना चाहिए। लेकिन, उस वक्त की केंद्र और तमिलनाडु सरकार की लापरवाही से यह भारत के हाथ से चला गया।

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