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Swaminathan Report  लागू करने के लिए क्यों कह रहे हैं किसान | ऐसा क्या है इस रिपोर्ट में | जानिए Swaminathan Report से जुड़ी पूरी जानकारी  

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अमन। MSP सहित अपने कई सारी मांगों को लेकर देश के किसान,  खासकर पंजाब के किसान एकबार फिर से केंद्र सरकार के खिलाफ सड़को पड़ प्रर्दशन कर रहे हैं । Swaminathan Report  लागू करने के लिए क्यों कह रहे हैं किसान | ऐसा क्या है इस रिपोर्ट में

इस प्रर्दशन में जिन चीजों पर सबसे ज्यादा  बात हो रही है, उनमें से एक स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट है। पर क्या आप जानते हैं कि ये स्वामीनाथन रिपोर्ट है क्या और किसान आंदोलन के समय आखिर इसका जिक्र इतना  बढ़ क्यों जाता है ? आज हम इसपर बात करेंगे .. 

 Swaminathan Report  क्या है ? 

स्वामीनाथन आयोग जिसे मूलत राष्ट्रीय किसान आयोग ( National Commission on Farmers ) कहा जाता है, इसका गठन तात्कालीन UPA की कांग्रेस सरकार ने 18 नवंबर 2004 को प्रोफेसर एम.एस. स्वामीनाथन  की अध्यक्षता में किया था। जिसका उद्देश देश भर में लगातार हो रहे किसानों के आत्महत्या के कारणों का पता लगाना था ।  इस आयोग ने क्रमशः दिसंबर 2004, अगस्त 2005, दिसंबर 2005 अप्रैल 2006 में चार रिपोर्ट और अपनी आखरी और पाँचवी रिपोर्ट 4 अक्टूबर 2006 को प्रस्तुत की। इन सभी रिपोर्टों को 11वीं पंचवर्षिय योजना में शामिल होना था पर ये कभी नहीं हो पाया । 

कौन थे M.S Swaminathan ? 

इस आयोग की सिफारिशों को जानने से पहले आइए हम जानते हैं कि आखिर एम एस स्वामीनाथन कौन थे । 

स्वामीनाथन ( M.S Swaminathan ) एक भारतीय कृषि वैज्ञानिक, प्रशासक और तत्कालिन कृषि मंत्रालय के मुख्य सचिव थे , उन्हें गेंहू और चावल  की उच्च उपज देने वाली किस्मों को पेश करने और आगे विकसित करने में उनके नेतृत्व और भूमिका के लिए उन्हें भारत में हरित क्रांति का मुख्य वास्तुकार के रूप में जाना जाता है ।उनका जन्म तत्कालिन मद्रास प्रेसिडेंसी के कुंभकोणम में 7 अगस्त 1925 को हुआ था। स्वामीनाथन अपने पिता एमके संबासिवन और माता  पार्वती थंगम्मल संबासिवन के दूसरे बेटे थे । हाल ही में भारत सरकार ने कृषि में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें भारत का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार “ भारत रत्न ” देने का  ऐलान किया है ।

स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें

आइए अब हम जानते हैं कि इस आयोग की मुख्य सिफारिशें क्या थीं ।  

आयोग ने कृषि से जुड़े कई मुद्दों पर बदलाव को लेकर सिफारिशें दी थीं, जिनमें सिचाई,भूमी बटवारा, भूमी सुधार, उत्पादन सुधार, ऋण और बीमा, खाद्य सुरक्षा, किसानों के लिए प्रतिस्पर्धा का माहौल तैयार करना, वितरण प्रणाली में सुधार, रोजगार को लेकर बदलाव आदि पर सुझाव दिए थे ।  

स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें विस्तार में  

आइए हम इनमें से कुछ सुधारों के बारे में विस्तारपूर्वक जानते हैं। 

भूमि बटवारा :-

आयोग की पहली चिंता देश में भूमी बटवारे में अंतर को लेकर था। इसमें कहा गया था कि 1991-92 में लगभग 50 फसिद लोगों के पास देश में केवल तीन प्रतिशत ही जमीन है जबकि कुछ लोग ऐसे हैं जिनके पास जरुरत से ज्यादा जमीन है । ऐसे में आयोग ने इसमें गंभीर बदलाव की सिफारिशें की थीं । 

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सिंचाई सुधार :-

आयोग ने सिंचाई को लेकर भी गंभीर चिंता जताई थी । आयोग का मानना था कि देश के किसानों के पास सिचाई के प्रयाप्त संसाधन मौजूद नहीं है, जिसका असर फसलों के उत्पादन पर पड़ता है । आयोग ने जल की उपलब्धता और वर्षा जल के संचय पर बल दिया था । साथ ही भूमीगत जल की स्थिति सुधारने के आलावा  ‘कुआं शोध कार्यक्रम’ शुरू करने की भी बात की थी ।  

भूमि सुधार :- 

इस आयोग ने एक सिफारिस देशभर में बेकार पड़ी जमीनों को उपजाऊ बना कर बटवारे की सिफारिस भी की थी ताकि उपजाऊ जमीन का रकबा बढाया जा सके । साथ ही आयोग ने लगातार उपजाऊ जमीन पर हो रहे निर्माण को लेकर भी चिंता जताई थी । आयोग का मानना था कि इससे उपजाऊ जमीन धीरे-धीरे कम हो रहा है ।  

रोजगार सुधार :-

आयोग ने खेती से जुड़े रोजगारों को बढाने को लेकर भी कई सुझाव दिए थे । आयोग के रिपोर्ट में ये दावा किया गया था कि 1961 में जहां देश में 75 फसिद लोग कृषि कार्य से जुड़े थे वहीं 1999 से 2000 में ये घटकर 59 प्रतिशत हो गया था । ये साफ संकेत था कि अब धीरे-धीरे लोग कृषि को छोड रहें हैं क्योंकि कृषि अब फायदेमंद नहीं रहा।  

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आयोग ने  कृषि सुधार को लेकर और भी कई सिफारिशें की थी पर दुर्भाग्य यह रहा कि इसे व्यापक रुप में कभी लागू ही नहीं किया गया । वर्तमान की केंद्र सरकार ने स्वामीनाथन को भारत रत्न देना का ऐलान तो कर दिया है लेकिन उसकी कमेटी द्वारा दी गई सिफारिशों को आज भी लागू नहीं कर पाई है।   

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