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Rebirth Theory: क्या है पुनर्जन्म सिद्धांत का रहस्य, आइए जाने इसका सच

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Raghunath Singh [Rebirth Theory]: मानव समाज और धार्मिक विचारधारा में “पुनर्जन्म” एक अत्यंत महत्वपूर्ण और रोचक विषय है। इसे संस्कृत में “पुनः” यानी “फिर से” “जन्म” यानी “जन्म” के शब्दों से निर्मित किया गया है।

Rebirth Theory के अनुसार, जीवात्मा कई बार जन्म लेता है तथा विभिन्न रूपों में पुनर्जन्म के माध्यम से संसार में फिर से आता है।

यह सिद्धांत अनेक धार्मिक परंपराओं में मिलता है, जैसे हिंदू धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म, और सिक्ख धर्म। यहां तक कि कुछ ग्रीक, एग्यूप्टियन, और क्रिस्तियन पाठकों में भी पुनर्जन्म की बात की जाती है।

Rebirth Theory: भारतीय संस्कृति में पुनर्जन्म का सिद्धांत

Rebirth Theory: भारतीय संस्कृति में पुनर्जन्म सिद्धांत को विशेष महत्व दिया गया है। भारतीय संस्कृति के अनुसार, जीवात्मा अमर है और इसे मृत्यु की नहीं, बल्कि शरीर के परिणाम की नई उत्पत्ति के रूप में माना जाता है।

अर्थात, जब एक व्यक्ति मर जाता है, तो उसकी आत्मा को एक नये शरीर में जन्म लेना होता है।

पुनर्जन्म का सिद्धांत धार्मिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के माध्यम के रूप में भी देखा जाता है।

यह व्यक्ति को अपने कर्मों की परिणाम भुगतने के लिए एक और अवसर प्रदान करता है, और उसे अपनी आत्मा की मुक्ति की ओर ले जाता है।

पुनर्जन्म सिद्धांत का रहस्य बहुत ही गहरा और प्राचीन है। इसे समझने के लिए, हमें धार्मिक और दार्शनिक परंपराओं का आधार लेना चाहिए।

यह सिद्धांत वेदांत, उपनिषदों, पुराणों, श्रीमद्भगवदगीता और तांत्रिक साहित्य में स्पष्ट रूप से प्रकट होता है।

वेदांत के अनुसार, आत्मा अविनाशी और अनंत है। यह सदा से ही अस्तित्व में है और न तो जन्म लेता है और न मरता है।

शरीर केवल एक आत्मा का एक आवास है, जो समय-समय पर इसे छोड़ देता है और फिर से नए शरीर में प्रवेश करता है।

उपनिषदों में भी इसी बात का उल्लेख है, जिनमें विभिन्न उपायों के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति का उल्लेख है। उनमें आत्मा को अविनाशी और नित्य माना गया है।

पुराणों और महाभारत के अनुसार, हर जीव अपने कर्मों के अनुसार अपने भविष्य को निर्मित करता है। कर्म और उनके फल के आधार पर जीवन के बाद भी उसे नए जन्म का सामना करना पड़ता है।

भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवदगीता (Shrimad Bhagavad Gita) में पुनर्जन्म का सिद्धांत की अवधारणा को स्पस्ट करते हैं। वे अर्जुन को बताते हैं-

“न त्वेवाहं  जातु नासं न त्वं नेमे।

न चैव न भविष्यम्रू सर्वे वयमत्रू परम् “।।

(गीता २/१२)

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, हे अर्जुन! ऐसा कभी भी समय नहीं था कि जब मैं नहीं था या तुम नहीं थे और ये सभी राजा न हों और ऐसा भी नहीं है कि भविष्य में हम सब नहीं रहेंगे।

वहीं वे आगे बताते हैं_

देहिनोैस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा 

  तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति

                                                                         (गीता 2/13)

जिस तरह शरीरधारी आत्मा इसशरीर में बाल्यावस्था से तरुणावस्था में और फिर वृद्धावस्था में निरन्तर अग्रसर होता रहती है, उसी प्रकार मृत्यु होने पर आत्मा दूसरे शरीर में चला जाती है।

वांसासि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोैपराणि।

तथा शरीराणि विहाय जीर्णा . न्यन्यानि संयाति नवानि देहि।

 जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर नए वस्त्र धारण करता हैए उसी प्रकार आत्मा पुराने तथा व्यर्थ के शरीरों को त्याग कर नवीन भौतिक शरीर धारण करता है। 

क्या है वैज्ञानिक दृष्टिकोण

हालांकि, वैज्ञानिक समुदाय इस सिद्धांत को स्वीकार नहीं करता है। उनका मानना है कि इसके लिए कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है और न किसी भी पूर्वानुमान का आधार है। वे इसे केवल धार्मिक और आध्यात्मिक विश्वास के रूप में मानते हैं।

मनुष्य के मन में पुनर्जन्म को लेकर प्रश्न सहज ही उठते रहते हैं। क्या होता है पुनर्जन्म क्यों होता है पुनर्जन्म। इसके साथ ही यह और सवाल चलता रहता है कि क्या जीवन और मरण का कोई अंत है।

पुनर्जन्म की अवधारणा हमारे कर्मफल सिद्धांत व आत्मा की अमरता से प्रकट हुई है। आत्मा को अपने कर्मों के फल को भोगने के लिए मरण के बाद पुनः नया शरीर धारण करना पड़ता है।  

भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने भी अर्जुन को जीवन के अनंत चक्र का वर्णन किया है, जिसमें आत्मा का अविनाशी और शरीर का अनादि और अनंतिक प्रकटावलंबन है।

भारतीय संस्कृति में पुनर्जन्म के सिद्धांत को बड़े ही गहराई से विश्लेषित किया गया है। यहां आत्मा के परिशुद्ध, अनन्त और अदित्य स्वरूप का उल्लेख किया गया है, जो पुनर्जन्म के रहस्य को समझने में मदद करता है।

इस प्रकार, हिंदू धर्म में पुनर्जन्म सिद्धांत व्यक्ति को अपने कर्मों के जिम्मेदार बनाता है और उसे अपने उच्चतम समर्पण की प्राप्ति के लिए मोक्ष की ओर ले जाता है। यह सिद्धांत हमें जीवन के अस्तित्व और महत्व को समझने का मार्ग प्रदान करता है और हमें समाज में सहानुभूति और समर्थन की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

समाज में धार्मिक और आध्यात्मिक विचारधाराओं का महत्व हमेशा से रहा है, और पुनर्जन्म सिद्धांत इसी कड़ी में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह एक ऐसा विचार है जो जीवन और मृत्यु के बारे में हमारे धार्मिक और आध्यात्मिक धारणाओं को समझने और समझाने का एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है।

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