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Wealth Distribution-Inheritance Tax क्या होते हैं? क्या है कांग्रेस की योजना?क्या वाकई पिता की संपत्ति में बेटों हक सिर्फ 45 फीसदी रह जाएगा?

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कांग्रेस नेता वेल्थ डिस्ट्रिब्यूशन की बात करते हुए कह रहे हैं कि वे ‘अडाणी-अंबानी की जेब से पैसे निकालकर गरीबों के जेब में रखना चाहते हैं।’ राहुल गांधी कहते हैं, जितना पैसा मोदीजी अडानी और बड़े अरबपतियों को दे रहे हैं, कांग्रेस की सरकार उतना पैसा सबसे गरीब लोगों की जेब में डालेगी। बहरहाल, यहां हम सियासत से इतर वेल्थ डिस्ट्रिब्यूशन की अवधारणा और नफा-नुकसान पर बात करते हैं, साथ ही बताएंगे कि राहुल गांधी के खास सिपहसालारों में शामिल सैम पित्रोदा जिस इन्हेरिटैंस टैक्स की बात कर रहे हैं उसका क्या मतलब है और क्यों यह मुद्दा गरमाया हुआ है?

क्या है वेल्थ डिस्ट्रिब्यूशन

किसी देश या समाज कितना धन समाज के किन लोगों, समूहों या वर्गों के हाथों में है। इसे वेल्थ डिस्ट्रिब्यूशन या धन वितरण कहा जाता है। यह एक तरीका है, जिससे आर्थिक असमानता या विषमता को दर्शाया जाता है। पिछले महीन आई वर्ल्ड इनइक्वेलिटी लैब की रिपोर्ट के मुताबिक भारत की 40 फीसदी संपत्ति देश के 1 फीसदी लोगों के हाथों में है। वहीं, ऑक्स फैम की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया की करीब 50 फीसदी संपत्ति दुनिया के 1 फीसदी लोगों के हाथों में है।

क्या कांग्रेस का विचार

कांग्रेस का कहना है कि देश की संपत्ति को बराबर बांटा जाए। असल में यह विचार नया नहीं है। वामपंथी दल लंबे समय से इस अवधारणा को ढो रहे हैं। यह विचार कार्ल मार्क्स के कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो का हिस्सा है, जिसमें कहा गया है कि समाज की संपत्ति को व्यक्ति की क्षमताओं के बजाय जरूरतों के मुताबिक बांटा जाना चाहिए। हालांकि, घोषित रूप से कम्युनिस्ट देश चीन और रूस में भी संपत्ति वितरण का यह फॉर्मुला काम नहीं करता है।

पित्रोदा का विरासत कर पर झूठा दावा

पित्रोदा ने कहा कि अमेरिका में 10 करोड़ डॉलर से ज्यादा की संपत्ति पर 55 फीसदी विरासत कर लगता है। व्यक्ति जब मरता है, तो उसकी 55 फीसदी संपत्ति समाज को मिलती है। लेकिन, भारत में 1000 करोड़ डॉलर की संपत्ति वाले लोगों के मरने पर लोगों को कुछ नहीं मिलता, पूरी संपत्ति उसके वारिस को मिल जाती है। जबकि, इसका बड़ा हिस्सा देश को मिलना चाहिए। भारत में भी इस तरह के कानून पर विचार किया जाना चाहिए। बहरहाल, पित्रोदा यहां तथ्यात्मक रूप से गलत हैं। अमेरिका में यह कर 40 फीसदी है। जापान में 55 फीसदी।

क्या है अमेरिका का विरासत कर 

असल में यह पित्रोदा ने कहा कि उतना सीधा नहीं है। बल्कि, अलग-अलग राज्यों मे अलग-अलग नियम हैं। संघीय नियमों के तहत इसे संघीय संपत्ति कर या फेडरल एस्टेट टैक्स कहा जाता है। इसके अलावा इसे डेथ टेक्स या पेरिस हिल्टन टेक्स भी कहा जाता है। इस कर इतनी तरह की छूट हैं कि 2021 में केवल 2,584 लोगों को ही यह टैक्स देना पड़ा। अमेरिका ही नहीं, दुनिया के तमाम देशों में यह कर लगता है, लेकिन इसका मकसद राजस्व वसूली या संपत्ति का सार्वजनिक वितरण नहीं, बल्कि वारिसों को सुविधाजनक तरीके से संपत्ति का अधिकार देना है।

लागू करना असंभव, व्यावहारिक नहीं

कार्ल मार्क्स जर्मनी में पैदा हुए, वहां उनका यह विचार कभी स्वीकारा नहीं गया। यहां तक कि रूस, चीन, क्यूबा, वेनेजुएला जैसे साम्यवादी देश भी कभी इस विचार को लागू नहीं कर पाए, क्योंकि यह व्यावहारिक नहीं है। अगर समाज में संपत्ति सभी में बराबर बांटी जाने लगी, तो समाज और देश की प्रगति रुक जाएगी। आखिर में व्यक्ति संपत्ति और विरासत खड़ी करने के लिए ही मेहनत करता है, अगर उससे उसकी संपत्ति और विरासत छीन ली जाए, तो कोई भी समाज या देश की उन्नति में योगदान नहीं देगा। बल्कि, हर व्यक्ति यही चाहेगा कि उसे बिना कुछ करे ही समाज की संपत्ति में हिस्सा मिलता रहे।

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