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UCC समान नागरिक संहिता क्या है? कौन प्रभावित होगा? क्या है जरूरत और स्थिति?

UCC UNIFORM CIVIL CODE

UCC (UNIFORM CIVIL CODE) समान नागरिक संहिता को लेकर देश में अलग-अलग राय देखने को मिल रही है। पूरे देश में इस नये कानून को लेकर जिज्ञासा, भय और भ्रम की मिश्रित भावना है। नागरिकों के लिए यह कानून वास्तव में क्या है? इसका मतलब क्या है, इससे क्या फायदा होगा, क्या कानून के सामने सभी धर्म बराबर होंगे? ऐसे ही कई सवालों के जवाब ढूंढने इस लेख में कोशिश की गई है।

समान नागरिक कानून की अवधारणा भारत के लिए नई नहीं है। यह कानून भारत के संविधान में ही निहित है। तमाम चर्चा और प्रयासों के बावजूद देश में अभी तक समान कानून सहित नहीं लायी जा सकी है। आजादी के बाद पहली बार उत्तराखंड राज्य में समान नागरिक संहिता पारित की गई। हालांकि इस कानून को लेकर विपक्षियों द्वारा भ्रम, डर पैदा करने का प्रयास किया जाता है। इस कानून के बारे में आरोप लगाया जाता है कि यह कानून दूसरे धर्मों का ख्याल नहीं रखता है। क्या ये कानून वाकई दूसरे धर्मों की आस्था को ठेस पहुंचाने वाला है? जानिए क्या कहता है ये कानून, क्या हैं इसके मायने…

UNIFORM CIVIL CODE (UCC – यूसीसी) क्या है?

समान नागरिक संहिता यह रेखांकित करती है कि देश का प्रत्येक नागरिक कानून के समक्ष समान हो। इसके पीछे असली फॉर्मूला ये है कि हर नागरिक के लिए एक कानून होना चाहिए। यह कानून कहता है कि जाति और धर्म की परवाह किए बिना, वह कानून के सामने समान है। समान नागरिक संहिता विवाह, तलाक और अचल संपत्ति के संबंध में सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होगी। समान नागरिक संहिता का मतलब एक न्यायसंगत कानून होगा। धर्म के आधार पर किसी को विशेष रियायतें या अनुग्रह नहीं मिलेगा। इस कानून का धर्म से कोई लेना-देना नहीं होगा.

1947 में, हिंदू कोड बिल केंद्रीय विधानमंडल द्वारा पेश किया गया था। लेकिन इसे भारी विरोध का सामना करना पड़ा और इसे अस्वीकार कर दिया गया। फिर 1951 में हिंदू कोड बिल को फिर से खारिज कर दिया गया। इस समय डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था। कई सालों के बाद बीजेपी इस कानून की फाइल पर पड़ी धूल झाड़ने में कामयाब रही। इस कानून से क्या हासिल होगा, इसे लेकर देशभर में चर्चा चल रही है.

UNIFORM CIVIL CODE UCC 1

UCC कानून की आवश्यकता क्यों है?

देश में विभिन्न पंथों और धर्मों के लोग हैं। उनके अलग-अलग कानून हैं। इससे न्यायपालिका पर अधिक बोझ पड़ रहा है। समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद सभी के लिए एक कानून होगा। इससे विभिन्न कानूनों के तहत दायर याचिकाओं की संख्या में कमी आएगी। साथ ही लंबे समय से लंबित मामलों का जल्द से जल्द निपटारा किया जाएगा। विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेना, संपत्ति के बंटवारे के लिए एक कानून होगा। इसलिए एक ही कानून से इस संबंध में विवादों को जल्द निपटाने में मदद मिलेगी।

समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद देश एक ही कानून से संचालित होगा, जिससे देश में एकता बढ़ेगी। जिससे विकास को बढ़ावा मिल सके। एक ही कानून होने से इसका राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ेगा। वोट बैंक की राजनीति रंग लाएगी. विचारों का ध्रुवीकरण रुकेगा।

महिलाओं को फायदा होगा

समान नागरिक संहिता से सबसे ज्यादा फायदा महिलाओं को होगा। भारतीय महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में भारी बदलाव की संभावना है। कुछ धर्मों ने महिलाओं के अधिकारों को सीमित कर दिया है। ऐसे में यह कानून उनके लिए बड़ी राहत साबित होगा। पिता की संपत्ति पर अधिकार और गोद लेने को लेकर देश में एक ही कानून होने से यह प्रक्रिया सुव्यवस्थित होगी।

वर्तमान में कौन से कानून लागू हैं

भारत का संविधान भारतीय नागरिकों की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। अनुच्छेद 25-28 प्रत्येक नागरिक को धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, पारसी और आदिवासी समुदायों के लिए अलग-अलग कानून हैं। देश में धार्मिक रीति-रिवाज, शादी, तलाक, विरासत का अधिकार, पैतृक संपत्ति, बहुविवाह जैसे मुद्दों पर कई कानून हैं। शादी की एक निश्चित उम्र होती है, लेकिन इस कानून का पालन हर समाज में नहीं किया जाता है। हिंदू धर्म में चाचा, चचेरे भाई, चाची से विवाह वर्जित माना गया है। अन्य धर्मों में ऐसी शादियों पर आपत्ति नहीं की जाती।

हिंदू विवाह अधिनियम 1955
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अंतर्गत आने वाले कानून
ईसाई विवाह अधिनियम 1872
भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925

हिंदुओं का क्या होगा –

हिंदू विवाह अधिनियम 1955, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 और अन्य सहायक कानूनों में संशोधन करना होगा। चूंकि हिंदुओं में बौद्ध, सिख, जैन भी शामिल हैं, इसलिए इस संबंध में भी कानून में संशोधन करना होगा।

इससे मुसलमानों पर क्या असर पड़ेगा –

मुस्लिम पर्सनल (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 में शादी, तलाक और गुजारा भत्ता का प्रावधान है। लेकिन समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद कई बदलाव होना तय है। हालांकि तीन तलाक का मुद्दा सुलझ गया है, बहुविवाह और कम उम्र में विवाह की प्रथाएं भी खत्म हो जाएंगी।

UNIFORM CIVIL CODE UCC

पारसी समाज के लिए निहितार्थ –

पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1936 के प्रावधानों के अनुसार, यदि कोई महिला किसी अन्य धर्म में शादी करती है, तो वह और उसके उत्तराधिकारी पारसी रीति-रिवाजों और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों का अधिकार खो देंगे। लेकिन समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद यह प्रावधान नहीं रहेगा।

ईसाइयों के लिए निहितार्थ –

जब यूसीसी लागू होगा, तो उत्तराधिकार, विरासत, गोद लेने के मामलों में धार्मिक अधिकार प्रभावित होंगे। ईसाई तलाक अधिनियम, 1869 की धारा 10ए(1) के तहत, आपसी सहमति से तलाक लेने के लिए पति और पत्नी को कम से कम दो साल तक अलग रहना पड़ता है। यदि यूसीसी लागू होता है तो यह प्रावधान इतिहास बन जाएगा। यही बात जनजातीय रीति-रिवाजों और अन्य कानूनों पर भी लागू होगी।

उत्तराखंड के कानून के प्रावधानों का क्या?

बीजेपी शासित उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता का पहला प्रयोग चल रहा है। मुख्यमंत्री पुष्करसिंह धामी ने 2022 में सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज रंजना देसाई की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की थी। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी. कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद इसका क्रियान्वयन शुरू हुआ। इसके लिए राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गयी थी। कानून के तहत लिव इन रिलेशनशिप का पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया। अनुबंध विवाह के लिए नियम और शर्तें लागू की गई हैं। हला, इद्दत, बहुविवाह प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। पुरुषों और महिलाओं को विरासत और पैतृक संपत्ति में समान अधिकार दिए गए हैं।

इन राज्यों में भी UCC पहल

उत्तराखंड सरकार के बाद बीजेपी के गढ़ गुजरात राज्य ने भी समान नागरिक संहिता के लिए तेजी से कदम उठाया है। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पहले ही इस कानून की वकालत कर चुके हैं। महाराष्ट्र में उपमुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़णवीस ने समान नागरिक संहिता का पक्ष लिया है। समान नागरिक संहिता का प्रयोग पहली बार पुर्तगाली शासन के दौरान 1867 में गोवा में किया गया था।

देश में पहला लोकसभा चुनाव कब और कैसे हुआ, यह प्रक्रिया कितने महीनों तक चली?

विरोध का कारण क्या है?

कहा जा रहा है कि समान नागरिक संहिता के सामने धर्म कोई मुद्दा नहीं है। यह सभी धार्मिक भारतीय नागरिकों के लिए एक सामान्य कानून है। लेकिन कई धार्मिक और अल्पसंख्यक समुदायों ने इसका विरोध किया है। उन्हें डर है कि यूसीसी उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक स्वायत्तता पर अतिक्रमण करेगा। उनका दावा है कि यह उनकी धार्मिक पहचान मिटाने का एक प्रयोग है। जबकि एक समूह को लगता है कि यह हिंदू धार्मिक रीति-रिवाजों, मान्यताओं और परंपराओं को थोपने का प्रयास है। इससे देश की विविधता खतरे में पड़ जायेगी। हालांकि इसके पीछे उनके पास ठोस तर्क नहीं हैं। केवल आशंकाओं और राजनीति के आधार पर समानता का विरोध किया जा रहा है। यह दुनिया का पहला उदाहरण है जहां अल्पसंख्यक समान नागरिक संहिता का विरोध करते हों। बल्कि अन्य देशों में समान अधिकार और कानूनों की मांग की जाती है।

दावा किया जा रहा है कि समान नागरिक संहिता संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है। अनुच्छेद 25 के अनुसार धार्मिक स्वतंत्रता में कटौती होगी। जबकि संविधान का अनुच्छेद 25 से 29 विभिन्न धार्मिक संस्कारों, पूजाओं और रीति-रिवाजों का पालन करने वाले वर्गों को धार्मिक अधिकार, स्वतंत्रता और अन्य अधिकार देता है। लेकिन उन्हें डर है कि समान नागरिक संहिता लागू होने पर ये अधिकार ख़त्म हो जायेंगे। हालांकि यह दावे भी केवल आशंकाओं के आधार पर हैं। तार्किकता और कानूनी प्रावधानों का इन आशंकाओं में अभाव है।

इस अधिनियम की आवश्यकता एवं प्रावधानों के बारे में जनता को समुचित जानकारी देना आवश्यक है।

इस देशों में नागरिक संहिता पहले से मौजूद है

जहां भारत समान नागरिक संहिता को लेकर संघर्ष कर रहा है, वहीं अन्य देशों ने समान कानून की वकालत की है। बेशक, चूंकि वहां धार्मिक स्थिति अनुकूल है, इसलिए उनके लिए यह कदम उठाना आसान हो गया है। पाकिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया, तुर्की, इंडोनेशिया, सूडान और मिस्र में समान कानून हैं।

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